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Showing posts from December, 2025

जब बुनियाद ही जर्जर तो दुनिया से कैसे कदमताल मिलाया जा सकता है ? #GroundReality

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हमारे आम आदमी अधिकार संगठन के whatsapp group में अक्सर ये बहस छिड़ जाती है की क्या हुआ मिन्हाज़ तेरा वादा वो कसम वो इरादा ? मैं हर बार मुस्कुरा देता हूँ। इस देश में हर महीने कहीं न कहीं कोई न कोई चुनाव चल रहा होता है. अभी हम महीने भर पहले बिहार के विधानसभा चुनाव से निपटे ही हैं, अब कुछ महीने में बिहार के पंचायत लोकल इलेक्शन की आहट हो जाएगी.  बदलाव की हर एक बात इस देश में अंततोगत्वा चुनाव पर ही जाकर रूकती है. हमारे साथी सह मित्र नवल किशोर सिंह जी अभी वर्तमान में बौरना पंचायत के सरपंच हैं, और मैंने पुरे जी-जान से नवल जी को सरपंच बनाने के लिए 2021 के पंचायत चुनाव में लड़ाई लड़ी क्योंकि मैं जानता हूँ ये आदमी भले 100 परसेंट रिजल्ट ना दे सके मगर 60 प्रतिशत- 70 प्रतिशत तो दे ही जायेगा इतना मुझे अपने दोस्तों की काबिलियत पर भरोसा है.  क्यों मैंने नवल किशोर सिंह का साथ दिया बौरना गाँव में GN बाँध के मुद्दों पर ग्रामीणों के साथ रिपोर्ट बनाते हुए सरपंच नवल किशोर सिंह — जहाँ ज़मीन से जुड़ी राजनीति की असली तस्वीर दिखाई देती है। हमारे साथी और सह-मित्र नवल किशोर सिंह आज बौरना पंचायत के सरपंच हैं।...

सत्ता, नैतिकता और धर्म: शासन के लिए नैतिक आधार की तलाश

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धर्म और नैतिकता का अटूट संबंध राजनीति का सार सत्ता प्राप्त करना और उसका उपयोग करना है, जबकि धर्म का सार जीवन को एक नैतिक अनुशासन देना है। जब राजनीति नैतिकता से भटक जाती है, तो वह केवल शक्ति का एक नग्न प्रदर्शन बन जाती है, जो भ्रष्टाचार और अन्याय को जन्म देती है। धर्म, इस संदर्भ में, एक 'चेक एंड बैलेंस' प्रणाली के रूप में कार्य कर सकता है, जो सत्ता को जवाबदेह और नैतिक बनाए रखने की क्षमता रखता है। यह आलेख धर्म को चुनावी राजनीति के संकीर्ण दायरे से परे, शासन और सार्वजनिक जीवन के लिए एक नैतिक आधार के रूप में देखता है। धर्म (Dharma) की व्यापक अवधारणा भारतीय दर्शन में, 'धर्म' शब्द केवल 'Religion' (पूजा पद्धति) तक सीमित नहीं है। इसका अर्थ है 'कर्तव्य', 'नैतिकता', 'सही आचरण', और 'सार्वभौमिक नियम' जो ब्रह्मांड और समाज को धारण करते हैं। प्राचीन ग्रंथों में, राजा (सत्ताधारी) का सबसे बड़ा धर्म 'राजधर्म' माना गया है, जिसका मूल तत्व प्रजा की सेवा और न्याय सुनिश्चित करना है। जब राजनीति इस 'राजधर्म' से विमुख हो जाती है, तो नैतिक स...

धर्म और राजनीति का अंतर्संबंध: भारतीय लोकतंत्र में संवैधानिक चुनौतियाँ और सामाजिक यथार्थ

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दो शक्तिशाली स्तंभों का टकराव धर्म और राजनीति, किसी भी समाज के दो सबसे शक्तिशाली और निर्णायक स्तंभ होते हैं। धर्म व्यक्ति के निजी जीवन, उसकी आस्था और नैतिकता को नियंत्रित करता है, जबकि राजनीति समाज के सार्वजनिक जीवन, शासन और संसाधनों के वितरण को निर्धारित करती है। भारतीय संदर्भ में, इन दोनों का संबंध अत्यंत जटिल, ऐतिहासिक और अक्सर विवादास्पद रहा है। भारत का संविधान आधिकारिक तौर पर देश को एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) गणराज्य घोषित करता है, जिसका अर्थ है कि राज्य का कोई धर्म नहीं है और वह सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान रखता है। हालांकि, व्यवहार में, धर्म भारतीय राजनीति की धुरी रहा है। संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता की दुविधा भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द 42वें संशोधन (1976) द्वारा जोड़ा गया था। भारत की धर्मनिरपेक्षता, पश्चिमी देशों की धर्मनिरपेक्षता (जो धर्म को राज्य से पूरी तरह अलग करती है) से भिन्न है। भारत 'सर्व धर्म समभाव' के सिद्धांत पर चलता है, जिसका अर्थ है कि राज्य सभी धर्मों को समान रूप से मानता है और उन्हें फलने-फूलने की अनुमति देता है। लेकिन इस स...