सत्ता, नैतिकता और धर्म: शासन के लिए नैतिक आधार की तलाश

धर्म और नैतिकता का अटूट संबंध

राजनीति का सार सत्ता प्राप्त करना और उसका उपयोग करना है, जबकि धर्म का सार जीवन को एक नैतिक अनुशासन देना है। जब राजनीति नैतिकता से भटक जाती है, तो वह केवल शक्ति का एक नग्न प्रदर्शन बन जाती है, जो भ्रष्टाचार और अन्याय को जन्म देती है। धर्म, इस संदर्भ में, एक 'चेक एंड बैलेंस' प्रणाली के रूप में कार्य कर सकता है, जो सत्ता को जवाबदेह और नैतिक बनाए रखने की क्षमता रखता है। यह आलेख धर्म को चुनावी राजनीति के संकीर्ण दायरे से परे, शासन और सार्वजनिक जीवन के लिए एक नैतिक आधार के रूप में देखता है।

धर्म (Dharma) की व्यापक अवधारणा

भारतीय दर्शन में, 'धर्म' शब्द केवल 'Religion' (पूजा पद्धति) तक सीमित नहीं है। इसका अर्थ है 'कर्तव्य', 'नैतिकता', 'सही आचरण', और 'सार्वभौमिक नियम' जो ब्रह्मांड और समाज को धारण करते हैं। प्राचीन ग्रंथों में, राजा (सत्ताधारी) का सबसे बड़ा धर्म 'राजधर्म' माना गया है, जिसका मूल तत्व प्रजा की सेवा और न्याय सुनिश्चित करना है।



जब राजनीति इस 'राजधर्म' से विमुख हो जाती है, तो नैतिक संकट पैदा होता है। वर्तमान राजनीति में नैतिक क्षरण के कई लक्षण दिखाई देते हैं:

  1. भ्रष्टाचार: निजी लाभ के लिए सार्वजनिक धन का दुरुपयोग।

  2. लोकतंत्र का ह्रास: असहमति को दबाना और सत्ता का केंद्रीकरण।

  3. जन कल्याण की अनदेखी: चुनावी लाभ के लिए अल्पकालिक योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करना, दीर्घकालिक सामाजिक समस्याओं की अनदेखी करना।

  4. द्वेष और घृणा: राजनीतिक उद्देश्यों के लिए समाज को बाँटना और भावनात्मक मुद्दों को हवा देना।

ऐसे में, धर्म की नैतिक शिक्षाएँ (सत्य बोलना, चोरी न करना, परोपकार, करुणा) राजनीति को उसके मूल कर्तव्य की ओर वापस लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

राजनीति में नैतिक मार्गदर्शन की आवश्यकता

आधुनिक राज्य को धर्म-आधारित राज्य होने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन उसे नैतिक-आधारित राज्य होना आवश्यक है। धर्म, भले ही व्यक्तिगत हो, सार्वभौमिक नैतिक मूल्यों का एक भंडार है। ये मूल्य किसी भी प्रभावी और निष्पक्ष शासन प्रणाली के लिए अपरिहार्य हैं।

उदाहरण के लिए:

  • न्याय (Justice): सभी धर्मों में न्याय को सर्वोच्च महत्व दिया गया है। राजनीतिक नेताओं को अपने निर्णयों में निष्पक्षता और सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए इस धार्मिक मूल्य से प्रेरणा लेनी चाहिए।

  • समानता (Equality): सिख धर्म में 'संगत' और 'पंगत' की परंपरा, या हिंदू धर्म के उपनिषदों में 'वसुधैव कुटुंबकम्' की अवधारणा, सभी मनुष्यों की मूलभूत समानता पर जोर देती है। राजनीति को जाति, वर्ग या धर्म के आधार पर भेदभाव को समाप्त करने के लिए इन मूल्यों को अपनाना चाहिए।

  • सेवा (Service): ईसाई धर्म में सेवा का महत्व, या इस्लाम में 'ज़कात' और दान का सिद्धांत, राजनीति को जनसेवा के प्रति प्रेरित करता है, न कि सत्ता-भोग के प्रति।

महात्मा गांधी और नैतिक राजनीति



महात्मा गांधी ने धर्म और राजनीति के बीच एक आदर्शवादी सेतु का निर्माण किया। उन्होंने कहा था, "जो लोग कहते हैं कि धर्म का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है, वे नहीं जानते कि धर्म क्या है।" गांधीजी के लिए धर्म का अर्थ किसी विशेष पूजा पद्धति से नहीं था, बल्कि सत्य और अहिंसा के नैतिक सिद्धांतों का पालन करना था।

उन्होंने राजनीति को शुष्क और अनैतिक शक्ति-संघर्ष के बजाय, जनसेवा और आत्म-शुद्धि का साधन माना। गांधीजी का यह मॉडल दिखाता है कि धर्म का उपयोग राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और नैतिक उत्थान के लिए किया जा सकता है। उन्होंने राजनीतिक आंदोलनों में उपवास, सत्याग्रह और सादगी को शामिल किया, जिससे सत्ता की भाषा बदल गई और वह नैतिक रूप से मजबूत हुई।

धर्मनिरपेक्ष नैतिकता का निर्माण

चूँकि भारत एक बहुधर्मी देश है, इसलिए किसी एक धर्म की नैतिकता को राजनीति पर थोपना संभव नहीं है। समाधान एक 'धर्मनिरपेक्ष नैतिकता' के निर्माण में निहित है, जो सभी धर्मों के साझा सार्वभौमिक मूल्यों पर आधारित हो।

इस धर्मनिरपेक्ष नैतिकता में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं:

  1. संवैधानिक निष्ठा: संविधान में निहित मूल्यों (लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व) के प्रति अटल प्रतिबद्धता।

  2. मानव गरिमा: प्रत्येक नागरिक की गरिमा का सम्मान करना, चाहे उसकी सामाजिक या आर्थिक स्थिति कुछ भी हो।

  3. पारदर्शिता और जवाबदेही: शासन में पूर्ण पारदर्शिता बनाए रखना और हर कार्रवाई के लिए जनता के प्रति जवाबदेह होना।

  4. पर्यावरण संरक्षण: प्रकृति और भविष्य की पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी महसूस करना।

इन मूल्यों को राजनीतिक शिक्षा, प्रशासनिक प्रशिक्षण और सार्वजनिक संवाद के माध्यम से बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

नैतिकता ही सर्वोच्च राजनीति है

धर्म और राजनीति के बीच की रेखा हमेशा पतली रही है। यदि इस रेखा को धार्मिक जुनून और चुनावी स्वार्थ से पार किया जाता है, तो यह समाज को विखंडित कर देती है। लेकिन अगर धर्म को एक नैतिक और प्रेरणादायक स्रोत के रूप में देखा जाता है—जो नेताओं को उनकी शक्ति का उपयोग न्याय, करुणा और सेवा के लिए करने के लिए प्रेरित करता है—तो यह लोकतंत्र को मजबूत करता है।

सत्ता का चरित्र तभी सकारात्मक हो सकता है जब उसे नैतिकता की लगाम द्वारा नियंत्रित किया जाए, और धर्म, अपने व्यापक अर्थ में, इस लगाम को प्रदान करने की क्षमता रखता है। एक आदर्श शासन प्रणाली वह है जहाँ सत्ताधारी अपने 'राजधर्म' का पालन करते हैं, और जनता अपने 'नागरिक धर्म' (जागरूकता और भागीदारी) का निर्वहन करती है। इस तरह, धर्म और राजनीति एक दूसरे के पूरक बन सकते हैं, न कि विरोधी।

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