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Showing posts from November, 2025

बिजली और सड़क का आंदोलन- तस्वीरों में. Part 3

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साल कोई भी हो, नेता और अधिकारियों की नियत जबतक सही नहीं होगी तबतक एक आम जनता को वही- बिजली पानी सड़क शिक्षा और स्वास्थ्य के मसले पर ही जिहाद करते रहना नियति बनी रहेगी. खगड़िया जिला का सतत आंदोलन वाला प्रखंड- गोगरी हमने 2024 में पहली बार जो आंदोलन शुरू किया, व्यवस्था को उस आंदोलन से मजबूर होकर काम करते हुए खुद को दिखाना पड़ा, इसे हम अपनी शुरूआती जीत मान कर चलते हैं पर हम उस जीत से संतुष्ट होकर बैठ नहीं गए, बल्कि अब लगातार पत्राचार के माध्यम से सत्ता और शाशन को अपनी आवाज बुलंद स्वर में सुनाते रहते हैं की जो दो कौड़ी का तुम फिलहाल काम कर रहे हो, आगे चलकर तुम्हे इसका परिणाम भुगतना तो पड़ेगा ही! भले अभी मौज ले लो. हम सबका हिसाब रख रहे हैं और सब दस्तावेजीकरण कर रहे हैं. इस वेबसाइट के माध्यम से भी हम अपने सारे आंदोलन को और अधिकारीयों की मनमानी को इन्टरनेट के पन्नों पर हमेशा-हमेशा के लिए लिख छोड़ रहे हैं ताकि हमारी लिगेसी को जो भी आगे बढ़ाये वो ये याद रखे की संविधान और कानून को अपने डुगडुगी की तरह बजाने वाले सभी नेता और अधिकारियों को कानून के रास्ते सजा भुगतना होगा. इस सीरीज में अबतक 2 भाग लिखी जा चु...

70 साल की लड़ाई-आखिर कबतक बिजली सड़क के लिए ही जनता को आंदोलन करना होगा? #MinhazAsks

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पिछला पोस्ट-  आजादी के 70 साल बाद भी बिजली पानी सड़क के लिए ही लड़ते रहेंगे ? #MinhazAsks में आपने पढ़ा की कैसे बुनियादी जरुरत के लिए भी हमें आज भी आंदोलन ही करना पड़ता है चाहे वो मुख्य मार्ग से गाँव को जाने वाली सड़क के लिए हो या फिर अन्दर के इलाके की सडकों की जरुरत हो या फिर किसी भी कोने का, बिना हल्ला-बोल किये ये भ्रष्ट व्यवस्था,  भ्रष्ट नेता टस से मस भी नहीं होते.  तस्वीर 1: खगड़िया जिला के अन्य क्षेत्र के लोग भी इस आन्दोलन को समर्थन देने पहुंचे. अभिशांक कुमार सानु जी से इस आन्दोलन में हमारी जानपहचान हुई. तिनका-तिनका जुटना शुरू हो चूका है! जुलाई 2024 में हमने आंदोलन करने का विचार बना लिया जिसके मुख्य बिंदु था- बिजली की समस्या जमींदारी बाँध को उंचा कर उसपर दो स्लुज़ (sluice) गेट का निर्माण जलनल योजना के अंतर्गत बने जलमीनार से पेयजल आपूर्ति अविलम्ब शुरू करना राशनकार्ड बनाने में घूसखोरी पर लगाम और दलालों को इससे बाहर करना इंदिरा आवास में घूसखोरी पर पूरी तरह से लगाम शौचालय निर्माण ने घूसखोरी पर लगाम पिछले पार्ट में आपने पढ़ा की मिन्हाज़ ने मीडिया से बात करते हुए इस आन्दोलन की भूम...

आजादी के 70 साल बाद भी बिजली पानी सड़क के लिए ही लड़ते रहेंगे ? #MinhazAsks

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आजादी  के 78 साल बाद भी हम किस चीज के लिए लड़ रहे हैं ? बिजली, पानी और सड़क !! जहर खाकर मर क्यूँ नही जाते हो रे नेताओं हरामखोरों ! तस्वीर 1: जुलाई 2024 की तस्वीर जिसमें मिन्हाज़ बिजली-सड़क के लिए धरना-प्रदर्शन से पहले मीडिया को संबोधित करते हुए दिख रहे हैं. जुलाई 2024.  मुझे- "मैं मिन्हाज़" MNC की लग्ज़री नौकरी छोड़ अपने गाँव लौटा, जिसे मेरे अब्बू अपने सभी बच्चो सहित मेरे बचपन में ही छोड़ बाहर चले गए थे अ पने बच्चों को पालने की मज़बूरी में, वो बच्चा मिन्हाज़ 35 साल की कच्ची जवानी में देश दुनिया देख अपने गाँव लौट आया था की अपने जीवन के अनुभवों को गाँव में बिखेर गाँव को आगे ले जाने की कोशिश करेगा. लेकिन यहाँ तो आगे क्या बढ़ना बेसिक आवश्यकता भी सही से मुहैया नहीं. और जिसकी जिम्मेदारी बनती है, वो जिम्मेदार लोग मस्ती से घुस खा-खाकर अपनी पुश्तों को चर्बी चढ़ा रहे. क्या है बेसिक जरूरते? सड़क, पानी, बिजली स्वास्थ्य और शिक्षा ही न ? इसमें भी एकदम आवश्यक जिंदगी जीने के लिए सड़क पानी और बिजली तो चाहिए ही न ?  ना गाँव में पीने का साफ़ पानी उपलब्ध. ना बिजली उपलब्ध. और जब बिजली हो भी तो आंखमिचौली का...

मिन्हाज़ और आम आदमी पार्टी: मेरी राजनैतिक यात्रा -2

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"रे मिन्हाज़, इहाँ त उहे जात-पात अउर हिंदूए-मियां पर लोग सब दिना नेता चुनते" 70 साल के मुजीबुर बाबा के मुंह से ये बात सुनकर तो एक बार मैं अन्दर से हिल गया! जब लोग "हिंदूए-मियां" और "इ जात उ जात" पर भोट देते रहेंगे तो सालों-साल ये जर्जर बदहाल सड़क हमें ही तो झेलना होगा न ! बोरना (खगड़िया, बिहार) की टूटी सड़क पर खड़े ग्रामीण — प्रशासन का ध्यान खींचने की सामूहिक पहल।

मैं मिन्हाज़ और aap : मेरी राजनैतिक चेतना की यात्रा - 1

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"का रे मिन्हाज़, केत्ता बढ़ियाँ ता तू कुवैत में कमाबे रहीं रे, काहे ल सब छोड़ छाड़ के पगलाहा केजरीवाल के पीछे पागल होके गाओं लौट अइल्ही रे?" मुझे अक्सर गाँव में लोग टोकते हैं और ये पूछते हैं. चित्र :1  2019 की एक तस्वीर. जब विदेश की नौकरी छोड़ दो पागल बदलाव की तमन्ना लिए- मैं मिन्हाज़ और भाई अन्नु प्रवीण ठेठी में जो मेरे जानने वाले रिश्तेदार या बड़े मुझसे बोलते हैं उसका हिंदी तर्जुमा बताता हूँ- "क्या रे मिन्हाज़, कितना बढ़िया तो तुम कुवैत में विदेशी कंपनी में मोटा तनख्वाह कमाता था, सब कुछ छोड़-छाड़ कर क्यूँ अरविन्द केजरीवाल के पीछे पागल होके गाँव-स्वदेश लौट आया रे?" हाँ! समय चाहे कितना भी अपनी धारा में बह जाए, सच्चाई तो मेरे जीवन की हमेशा यही रहेगी की मेरी सोच में, मेरी शख्सियत में जो भी बदलाव आया है उसके पीछे बहुत बड़ा कारण अरविन्द केजरीवाल की शक्सियत का ही रहा है.  और ये सिर्फ अकेले एक मिन्हाज़ की ही दास्ताँ नहीं है बल्कि मिन्हाज़ की तरह हजारों युवाओं ने अपनी विदेश की लग्जरी नौकरी और handsome सैलरी को छोड़ कर वापस अपना देश लौट देश में बदलाव की राजनीति में अपना सबकुछ स्वाहा कर द...