मैं मिन्हाज़ और aap : मेरी राजनैतिक चेतना की यात्रा - 1

"का रे मिन्हाज़, केत्ता बढ़ियाँ ता तू कुवैत में कमाबे रहीं रे, काहे ल सब छोड़ छाड़ के पगलाहा केजरीवाल के पीछे पागल होके गाओं लौट अइल्ही रे?" मुझे अक्सर गाँव में लोग टोकते हैं और ये पूछते हैं.

आम आदमी पार्टी की टोपी पहने खगड़िया जिला युवाध्यक्ष मिन्हाज़ भारती आप बिहार-प्रदेश युवाध्यक्ष अन्नु प्रवीण और ग्रामीण लोगों के साथ
चित्र :1  2019 की एक तस्वीर. जब विदेश की नौकरी छोड़ दो पागल बदलाव की तमन्ना लिए- मैं मिन्हाज़ और भाई अन्नु प्रवीण

ठेठी में जो मेरे जानने वाले रिश्तेदार या बड़े मुझसे बोलते हैं उसका हिंदी तर्जुमा बताता हूँ- "क्या रे मिन्हाज़, कितना बढ़िया तो तुम कुवैत में विदेशी कंपनी में मोटा तनख्वाह कमाता था, सब कुछ छोड़-छाड़ कर क्यूँ अरविन्द केजरीवाल के पीछे पागल होके गाँव-स्वदेश लौट आया रे?"

हाँ! समय चाहे कितना भी अपनी धारा में बह जाए, सच्चाई तो मेरे जीवन की हमेशा यही रहेगी की मेरी सोच में, मेरी शख्सियत में जो भी बदलाव आया है उसके पीछे बहुत बड़ा कारण अरविन्द केजरीवाल की शक्सियत का ही रहा है.

 और ये सिर्फ अकेले एक मिन्हाज़ की ही दास्ताँ नहीं है बल्कि मिन्हाज़ की तरह हजारों युवाओं ने अपनी विदेश की लग्जरी नौकरी और handsome सैलरी को छोड़ कर वापस अपना देश लौट देश में बदलाव की राजनीति में अपना सबकुछ स्वाहा कर देने का जूनून पर सवार हो गए. 

2019 में गाँव में बच्चों के साथ मिन्हाज़ भारती की तस्वीर, गूगल फोटोज़ की यादों से
चित्र:2 Google Photos की एक याद — अप्रैल 2019, गाँव और बच्चों के बीच।
गाँव में स्कूली बच्चों के साथ मिन्हाज़ भारती, 2019 में ग्रामीण राजनीति के दौरान
चित्र :3 यही बच्चे, यही गाँव — यहीं से बिहारी राजनीति का जमीनी मतलब समझ आया।

जब हम अपनी मिट्टी को ही ना दुरुस्त कर सकें तो फिर क्या करना पैसे का, ऐशों-आराम का, गाड़ी-बंगले का?

  • आखिरत में खुदा को क्या जबाब देंगे जब वो पूछेगा की "आवाम के इन्साफ की लड़ाई जब चल रही थी तब तू कहाँ था रे मिन्हाज़ ?"

"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" का जो ज्ञान मेरे पूर्वज सियावर रामचंद्र जी महराज ने दिया वो अगर मैं भूल जाऊं पैसे की चमक के पीछे तो फिर क्या फायदा मेरे बाप के उस त्याग और मेहनत का जो मैंने बचपन में देखा जब वो हमें गरीबी और जाहिलियत के दलदल से निकालने के लिए गाँव से निकल दिल्ली  लेकर गए, वहां अब्बू ने हर तरह की मजदूरी करते हुए हमें पढ़ाया लिखाया काबिल बनाया हम सब भाई MNC में नौकरी हासिल किये, और अब्बा गाँव को हमेशा एक दर्द के साथ याद करते रहे. अपनी मिट्टी, अपनी जमीं से अलग होने का दर्द मैंने अपने अब्बा के चेहरे पर हमेशा पढ़ा !

मुझे वह भारत चाहिए जो डर से नहीं, भरोसे से चलता हो. 

सत्ता आनी है जानी है ये राजनितिक पार्टीयों के लिए चलेगा, लेकिन हम जनता लिए सत्ता का आना जाना ये तय करता है की हम नागरिकों को क्या भविष्य मिलेगा ? क्या दशकों-सदियों तक वहीँ मंदिर-मस्जिद, धर्म-जात-उंच-नीच के नाम पर हमें लड़ाते हुए नेता लोग रईस होते जायेंगे और हम आम जनता की समूहिक चेतना शून्य हो जाएगी या फिर हम भारत को विश्व में आगे भाग रहे देशों की कतार में खड़ा कर पाने की इच्छाशक्ति रखने वाले नेताओं को अपना समर्थन देकर उनको मजबूत कर सकेंगे?

हर दिन ये देश एक नया राजनितिक-प्रोपोगंडा झेलता है. क्या हम एक बिहारी होने के नाते ये डेटा चेक कर सकते हैं की इस राज्य के सत्तारूढ़ नेताओं ने कितनी बार इन पांच साल में शिक्षा को लेकर एक स्पष्ट दृष्टिकोण सामने रखा है और और विस्तृत रोडमैप सामने रखा है?

आंदोलन के दौरान AAP के वरिष्ठ साथी और दिल्ली सरकार में शिक्षामंत्री मनीष सिसोदिया के साथ मिन्हाज़ भारती
आंदोलन के दौरान के कई वरिष्ठ साथी जो पार्टी की सफलता के बाद मंत्री भी बने,
उनमे मनीष सिसोदिया जी मुझे सबसे ज्यादा inspire करते हैं, 
अपनी शिक्षा आधारित राजनीति के कारण।

प्रोपगंडा, जो हमारी नसलों को तबाह कर डालती है, प्रोपगंडा अगर हमारे एक फैसले को प्रभावित करती है तो ना सिर्फ हमारा वर्तमान बल्कि हमारा भविष्य भी अँधेरे कुँए में डूब जाता है. मुझे याद नहीं आता है की हमारे हिंदी बेल्ट में पिछले 10 साल में ऐसा कौन सा नेता या शिक्षामंत्री हुआ है राज्यों में और केंद्र में जिसने बच्चों की शिक्षा के लिए कोई मजबूत रोडमैप और विजन पेश किया हो ?
कोई स्पष्ट कम्पेयर प्रस्तुत किया हो? मनीष सिसोदिया इस भीड़ से अलग हैं. पाप-पुण्य में यकीन रखते तो उपरवाला जरुर इस पाप का सजा उनलोगों को देगा जिन्होंने दिल्ली के बच्चों से एक विजनरी शिक्षामंत्री छीन लिया. बतौर शिक्षा-मंत्री मनीष सिसोदिया के दिल्ली के सरकारी स्कूलों में किये गए कामों की विस्तृत जानकारी हर एक बिहारी को लेनी चाहिए खासकर उन मां-बाप को जो अपनी आर्थिक मजबूरियों के कारण अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाते हैं. प्राइवेट स्कूल ऐसे माँ-बाप अफोर्ड नहीं कर सकते, और बिहार के सरकारी स्कूल की बिल्डिंग, शिक्षा की गुणवत्ता, इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्या हाल हैं ये कौन नहीं जानता ?

मेरी राजनैतिक चेतना की यात्रा की ये सीरिज जारी रहेगी. मैं धन्यवाद करना चाहता हूँ अपने साथी मयंक जी का जो अपनी जीवन की विषमतम परिस्थितियों से लड़ते हुए भी मुझे अपनी कहानी ना सिर्फ मेरे इस लेख से दुनिया को बताने के लिए उत्साहित करते हैं बल्कि खुद  भी समय निकाल कर मेरी कहानियों को लिखने में मेरी सहायता कर रहे हैं. यह लेख मेरी राजनैतिक चेतना की यात्रा का एक पड़ाव है।
यह यात्रा अभी जारी है।
आगे, मैं उन साथी की कहानियाँ भी साझा करूँगा जिन्होंने विषम परिस्थितियों में भी विचार और ईमानदारी का रास्ता नहीं छोड़ा 
-मैं मिन्हाज़!


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