मैं मिन्हाज़ और aap : मेरी राजनैतिक चेतना की यात्रा - 1
"का रे मिन्हाज़, केत्ता बढ़ियाँ ता तू कुवैत में कमाबे रहीं रे, काहे ल सब छोड़ छाड़ के पगलाहा केजरीवाल के पीछे पागल होके गाओं लौट अइल्ही रे?" मुझे अक्सर गाँव में लोग टोकते हैं और ये पूछते हैं.
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| चित्र :1 2019 की एक तस्वीर. जब विदेश की नौकरी छोड़ दो पागल बदलाव की तमन्ना लिए- मैं मिन्हाज़ और भाई अन्नु प्रवीण |
ठेठी में जो मेरे जानने वाले रिश्तेदार या बड़े मुझसे बोलते हैं उसका हिंदी तर्जुमा बताता हूँ- "क्या रे मिन्हाज़, कितना बढ़िया तो तुम कुवैत में विदेशी कंपनी में मोटा तनख्वाह कमाता था, सब कुछ छोड़-छाड़ कर क्यूँ अरविन्द केजरीवाल के पीछे पागल होके गाँव-स्वदेश लौट आया रे?"
हाँ! समय चाहे कितना भी अपनी धारा में बह जाए, सच्चाई तो मेरे जीवन की हमेशा यही रहेगी की मेरी सोच में, मेरी शख्सियत में जो भी बदलाव आया है उसके पीछे बहुत बड़ा कारण अरविन्द केजरीवाल की शक्सियत का ही रहा है.
और ये सिर्फ अकेले एक मिन्हाज़ की ही दास्ताँ नहीं है बल्कि मिन्हाज़ की तरह हजारों युवाओं ने अपनी विदेश की लग्जरी नौकरी और handsome सैलरी को छोड़ कर वापस अपना देश लौट देश में बदलाव की राजनीति में अपना सबकुछ स्वाहा कर देने का जूनून पर सवार हो गए.
- आखिरत में खुदा को क्या जबाब देंगे जब वो पूछेगा की "आवाम के इन्साफ की लड़ाई जब चल रही थी तब तू कहाँ था रे मिन्हाज़ ?"
"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" का जो ज्ञान मेरे पूर्वज सियावर रामचंद्र जी महराज ने दिया वो अगर मैं भूल जाऊं पैसे की चमक के पीछे तो फिर क्या फायदा मेरे बाप के उस त्याग और मेहनत का जो मैंने बचपन में देखा जब वो हमें गरीबी और जाहिलियत के दलदल से निकालने के लिए गाँव से निकल दिल्ली लेकर गए, वहां अब्बू ने हर तरह की मजदूरी करते हुए हमें पढ़ाया लिखाया काबिल बनाया हम सब भाई MNC में नौकरी हासिल किये, और अब्बा गाँव को हमेशा एक दर्द के साथ याद करते रहे. अपनी मिट्टी, अपनी जमीं से अलग होने का दर्द मैंने अपने अब्बा के चेहरे पर हमेशा पढ़ा !
मुझे वह भारत चाहिए जो डर से नहीं, भरोसे से चलता हो.
सत्ता आनी है जानी है ये राजनितिक पार्टीयों के लिए चलेगा, लेकिन हम जनता लिए सत्ता का आना जाना ये तय करता है की हम नागरिकों को क्या भविष्य मिलेगा ? क्या दशकों-सदियों तक वहीँ मंदिर-मस्जिद, धर्म-जात-उंच-नीच के नाम पर हमें लड़ाते हुए नेता लोग रईस होते जायेंगे और हम आम जनता की समूहिक चेतना शून्य हो जाएगी या फिर हम भारत को विश्व में आगे भाग रहे देशों की कतार में खड़ा कर पाने की इच्छाशक्ति रखने वाले नेताओं को अपना समर्थन देकर उनको मजबूत कर सकेंगे?
हर दिन ये देश एक नया राजनितिक-प्रोपोगंडा झेलता है. क्या हम एक बिहारी होने के नाते ये डेटा चेक कर सकते हैं की इस राज्य के सत्तारूढ़ नेताओं ने कितनी बार इन पांच साल में शिक्षा को लेकर एक स्पष्ट दृष्टिकोण सामने रखा है और और विस्तृत रोडमैप सामने रखा है?
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| आंदोलन के दौरान के कई वरिष्ठ साथी जो पार्टी की सफलता के बाद मंत्री भी बने, उनमे मनीष सिसोदिया जी मुझे सबसे ज्यादा inspire करते हैं, अपनी शिक्षा आधारित राजनीति के कारण। |




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