खोजने निकलो तो खुदा भी मिल जाये- जिद्दी जुनूनियों की कमी है क्या?

मैं अकेला चल पड़ा कर्तव्यपथ पर,
और देखते-देखते कारवां बनता गया।

कुछ ऐसा ही हाल है मेरा — यानी Notice कीजिए, मिन्हाज़ भारती का।

2019 में मैं कुवैत से नौकरी छोड़कर भारत लौटा। इरादा शायद वही पुराना था — थोड़ी देर रुकूँगा और फिर उसी ज़िंदगी की ओर लौट जाऊँगा जहाँ से कमाई, सुरक्षा और “settled life” का रास्ता दिखता था।
लेकिन जीवन कभी-कभी हमें उस मोड़ पर ले आता है जहाँ लौटना आसान नहीं होता, और रुक जाना ही असली फैसला बन जाता है।

मैं उस रास्ते की ओर लौट आया जहाँ से कभी हमारे प्यारे अब्बा-हुज़ूर ने गरीबी और अशिक्षा के नाले से निकलने का सपना देखा था।
उन्होंने सालों पहले अपना घर, अपनी ज़मीन छोड़कर परदेस का रुख किया। दिल्ली पहुँचे। सिलाई की, मज़दूरी की।
वह पढ़े-लिखे थे — पटना यूनिवर्सिटी से साइंस ग्रेजुएट — तो पढ़ाने का मौका भी मिला।
प्राइवेट ट्यूशन करते हुए बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, काबिल बनाया।
और उन्हीं की मेहनत की बदौलत हम, उनकी औलादें, अच्छी तालीम पाकर अच्छी नौकरी तक पहुँचे।

लेकिन मैं भी तो आख़िर अपने अब्बा की ही औलाद ठहरा।

जिसका बाप इतना जुनूनी हो,
अगर उस जुनून का एक कतरा भी उसकी औलाद में न आए,
तो वह औलाद किसी काम की नहीं।

इसी जुनून ने मुझे लगभग 30 साल बाद अपनी मिट्टी, अपने गाँव बौरना वापस खींच लाया।
अब मेरा कर्तव्य साफ़ हो चुका था —
सिर्फ़ अपनी ज़िंदगी सँवारनी नहीं है,
मिट्टी को सँवारना है।

एक मिन्हाज़ नहीं,
अनेकों मिन्हाज़ तैयार करने हैं।


2021… और जिद्दी जुनूनियों से मुलाक़ात

Minhaz Bharti sitting with divyang artists cum activist pawan paswanduring a cultural and social interaction in Gogri Bihar
गोगरी में दिव्यांग कलाकारों के साथ बैठा एक क्षण — जहाँ संघर्ष, संगीत और संकल्प एक साथ दिखाई देते हैं।

साल 2021 में मुझे गोगरी में कुछ ऐसे लोग मिले,
जो समाज की परिभाषाओं से कहीं आगे खड़े थे।

वे जिद्दी थे,
वे जुनूनी थे।

नाम है- पवन पासवान

उनकी शारीरिक अवस्था उन्हें “विकलांग” कहती है,
सरकार उन्हें “दिव्यांग” कहती है —
लेकिन उनकी आत्मा उन्हें संघर्षशील इंसान साबित करती है।

पवन जी और इनके जैसे संघर्षशील लोगो ने, इन सभी ने मिलकर अपना एक संगठन बनाया है।
सरकार और सिस्टम के उस रवैये के ख़िलाफ़,
जो विकलांगों के साथ अक्सर बेईमानी, बेइज़्ज़ती और कुव्यवस्था करता है।

ये लोग सिर्फ़ हक़ की लड़ाई नहीं लड़ते,
ये हुनर के फनकार हैं।

कोई गाता है,
कोई बजाता है,
कोई शब्दों से लड़ाई लड़ता है।

जब मैंने इन्हें पास से देखा, इनके बीच बैठा,
तो समझ आया —
खोजने निकलो तो खुदा भी मिल जाता है।

बस कमी है तो
जिद्दी जुनूनियों की।

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