धर्म, सत्ता और लोकतंत्र: शंकराचार्य से शुरू हुआ असहमति को कुचलने का सिलसिला

असहमति का अपराधीकरण: जब सत्ता, मीडिया और धर्म एक साथ लोकतंत्र के विरुद्ध खड़े हों

जय हिंद।
यह लेख किसी एक व्यक्ति, एक चैनल या किसी एक समुदाय के विरुद्ध नहीं है। यह लेख उस बेचैनी से जन्मा है, जो तब पैदा होती है जब सत्ता, मीडिया और तकनीक—तीनों मिलकर समाज की चेतना, संस्कृति और आत्मा को प्रभावित करने लगें। यह चिंता केवल हिंदुओं की नहीं है, न मुसलमानों की, न किसी एक धर्म या वर्ग की। यह चिंता भारत के लोकतांत्रिक, संवैधानिक और नैतिक चरित्र की है।

मैं उस दौर में बड़ा हुआ हूँ जब दूरदर्शन पर मिले सुर मेरा तुम्हारा और एक रहे जैसे जैसे गीत चलते थे। वह समय जब सत्ता और समाज की साझा कोशिश लोगों को जोड़ने की होती थी, तोड़ने की नहीं। आज का समय इससे अलग है—और इसी फर्क को समझना इस लेख का उद्देश्य है।


मैं कौन हूँ और अपनी बात रखने का अधिकार क्यों रखता हूँ

मैं जन्म से एक भारतीय मुसलमान हूँ। लेकिन मैंने अपनी पूरी समझ और सार्वजनिक जीवन में हमेशा धर्म के आधार पर नफरत, भेदभाव और हिंसा का विरोध किया है। मैं अस्सलाम वालेकुम उतनी ही सहजता से बोलता हूँ, जितनी सहजता से जय सियावर रामचंद्र

मेरे लिए सियावर रामचंद्र केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं हैं। वे अन्याय के प्रतिकार, नैतिक साहस, पारिवारिक एकता, प्रेम और मर्यादा के प्रतीक हैं। एक मुसलमान होकर राम का जयघोष करना मेरे लिए कोई राजनीतिक स्टंट नहीं, बल्कि भारत की उस साझी सांस्कृतिक परंपरा की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है, जिसमें धर्म दीवार नहीं बल्कि सेतु रहा है।

मैं मानता हूँ कि अगर यह बात मजबूती से रखी जाए, तो यह केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं रहती, बल्कि व्यापक समाज के बीच संवाद की संभावना खोलती है।

इस विषय पर मैंने विस्तार से वीडियो में भी अपनी बात रखी है। अगर आप इस मुद्दे को सुनना और महसूस करना चाहते हैं, तो नीचे दिया गया वीडियो देखें।

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शंकराचार्य से जुड़ा विवाद: मुद्दा व्यक्ति नहीं, परंपरा और विचार का है

जब देश के वरिष्ठ धर्मगुरु शंकराचार्य को सार्वजनिक विमर्श में अपमानजनक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है, तो यह प्रश्न केवल किसी एक संत का नहीं रहता। शंकराचार्य भारत की दार्शनिक, बौद्धिक और नैतिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं। चारों दिशाओं में स्थित शंकराचार्य पीठें भारत की सांस्कृतिक एकता और बौद्धिक निरंतरता का प्रतीक हैं।

इसलिए शंकराचार्य का अपमान वस्तुतः पूरे समाज और देश की आत्मा का अपमान बन जाता है। यह बात समझना जरूरी है, क्योंकि जब हम व्यक्ति से आगे बढ़कर संस्था, परंपरा और विचार को देखना शुरू करते हैं, तभी लोकतांत्रिक चेतना विकसित होती है।


मीडिया, एआई और नैतिक जिम्मेदारी का सवाल

आज मीडिया केवल समाचार देने का माध्यम नहीं रह गया है। वह समाज की सोच को गढ़ने वाला सबसे प्रभावशाली उपकरण बन चुका है। ऐसे में जब मीडिया संस्थान तकनीक, विशेषकर एआई, का उपयोग किसी संत या वैचारिक असहमति रखने वाले व्यक्ति को राक्षसी या नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करने के लिए करते हैं, तो यह केवल रचनात्मक प्रयोग नहीं रह जाता।

यह एक गंभीर नैतिक प्रश्न बन जाता है—कि क्या तकनीक का उपयोग संवाद के लिए हो रहा है या दुष्प्रचार और चरित्र-हनन के लिए। तकनीक अपने आप में न अच्छी होती है, न बुरी। उसका उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है, वही उसे नैतिक या अनैतिक बनाता है।


राजनीतिक भाषा, प्रतीक और ‘कालनेमि’ का संदर्भ

जब राजनीति धार्मिक प्रतीकों को अपने हित में प्रयोग करने लगती है, तो विमर्श का स्तर गिरने लगता है। ‘कालनेमि’ जैसे प्रतीक केवल पौराणिक संदर्भ नहीं रखते, बल्कि समाज में किसी व्यक्ति या विचार को खलनायक के रूप में स्थापित करने का माध्यम बन जाते हैं।

यह वही बिंदु है जहाँ राजनीति, मीडिया और धर्म का खतरनाक संगम दिखाई देता है—और लोकतंत्र के लिए यही सबसे बड़ा खतरा होता है।


असहमति, दमन और तानाशाही प्रवृत्ति

लोकतंत्र में असहमति कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत होती है। लेकिन आज स्थिति यह है कि सत्ता के विमर्श से अलग राय रखने वाले हर व्यक्ति को दबाने की कोशिश की जाती है। चाहे वह किसान हो, छात्र हो, पत्रकार हो या फिर शंकराचार्य जैसे वरिष्ठ संत।

यह प्रवृत्ति किसी एक समुदाय को नहीं, बल्कि हर भारतीय को प्रभावित करती है—हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई सभी को। जब असहमति को कुचला जाता है, तो अंततः लोकतंत्र ही घायल होता है।


नवल किशोर सिंह का उदाहरण: विचार और संघर्ष की निरंतरता

मैंने अपने जीवन में केवल बोलने का रास्ता नहीं चुना है। जब अपने क्षेत्र में अन्याय के खिलाफ खड़े होने का सवाल आया, तो मैंने नवल किशोर सिंह को सरपंच बनाने की लड़ाई भी लड़ी। यह लड़ाई केवल एक व्यक्ति को पद पर बैठाने की नहीं थी, बल्कि यह दिखाने की थी कि संगठित होकर, संवैधानिक तरीके से अन्याय को चुनौती दी जा सकती है

आज जो बात मैं मीडिया, सत्ता और संतों के सम्मान को लेकर कह रहा हूँ, वह उसी विचारधारा की निरंतरता है। विचार अलग-अलग मुद्दों पर हो सकते हैं, लेकिन मूल सिद्धांत वही रहता है—अन्याय का विरोध और न्याय का पक्ष।


पाखंड, अंधविश्वास और मीडिया की भूमिका

मैंने बिहार के गांवों में बहुत करीब से देखा है कि कैसे पाखंड और अंधविश्वास शिक्षा, विवेक और वैज्ञानिक सोच को नुकसान पहुँचाते हैं। मीडिया का दायित्व ऐसे पाखंड के खिलाफ खड़ा होना था। लेकिन जब वही मीडिया स्वयं अपमान और भ्रम फैलाने लगे, तो चिंता और भी गहरी हो जाती है।

यह केवल विडंबना नहीं, बल्कि एक स्पष्ट चेतावनी है कि अगर समाज ने समय रहते सवाल नहीं उठाए, तो नुकसान स्थायी हो सकता है।


मेरी वैचारिक स्थिति और उद्देश्य

मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि मेरी लड़ाई:

  • किसी धर्म के खिलाफ नहीं है

  • किसी समुदाय के खिलाफ नहीं है

  • किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं है

मेरी लड़ाई है:

  • अन्याय के खिलाफ

  • नफरत के खिलाफ

  • पाखंड के खिलाफ

  • और संविधान, लोकतंत्र व भाईचारे के पक्ष में

मैं चाहता हूँ कि लोग मुझे केवल एक यूट्यूबर के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे नागरिक के रूप में देखें जो सोचता है, लिखता है और बोलता है—तीनों को समान गंभीरता से लेता है


निष्कर्ष: यह किसका मुद्दा है?

यह मुद्दा हिंदू बनाम मुसलमान का नहीं है। यह मुद्दा सम्मान बनाम अपमान, संविधान बनाम तानाशाही और संवाद बनाम दमन का है।

आज सस्ता इंटरनेट और मोबाइल कैमरा हर किसी को वीडियो बनाने की सुविधा देता है। लेकिन विचार, वैचारिक ईमानदारी और नैतिक साहस आज भी दुर्लभ हैं। मैं अपने विचारों को अपनी पहचान से डरे बिना, पूरी गंभीरता के साथ रखने में विश्वास करता हूँ।

अगर आज हम चुप रहे, तो कल कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा—न संत, न नागरिक, न लोकतंत्र।

जय सियावर रामचंद्र।
जय भारत।
जय संविधान।


नोट (डिस्क्लेमर)

यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी धर्म, समुदाय या व्यक्ति के प्रति नफरत फैलाना नहीं, बल्कि गंभीर, जिम्मेदार और स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श को बढ़ावा देना है।


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