धर्म और नैतिकता का अटूट संबंध राजनीति का सार सत्ता प्राप्त करना और उसका उपयोग करना है, जबकि धर्म का सार जीवन को एक नैतिक अनुशासन देना है। जब राजनीति नैतिकता से भटक जाती है, तो वह केवल शक्ति का एक नग्न प्रदर्शन बन जाती है, जो भ्रष्टाचार और अन्याय को जन्म देती है। धर्म, इस संदर्भ में, एक 'चेक एंड बैलेंस' प्रणाली के रूप में कार्य कर सकता है, जो सत्ता को जवाबदेह और नैतिक बनाए रखने की क्षमता रखता है। यह आलेख धर्म को चुनावी राजनीति के संकीर्ण दायरे से परे, शासन और सार्वजनिक जीवन के लिए एक नैतिक आधार के रूप में देखता है। धर्म (Dharma) की व्यापक अवधारणा भारतीय दर्शन में, 'धर्म' शब्द केवल 'Religion' (पूजा पद्धति) तक सीमित नहीं है। इसका अर्थ है 'कर्तव्य', 'नैतिकता', 'सही आचरण', और 'सार्वभौमिक नियम' जो ब्रह्मांड और समाज को धारण करते हैं। प्राचीन ग्रंथों में, राजा (सत्ताधारी) का सबसे बड़ा धर्म 'राजधर्म' माना गया है, जिसका मूल तत्व प्रजा की सेवा और न्याय सुनिश्चित करना है। जब राजनीति इस 'राजधर्म' से विमुख हो जाती है, तो नैतिक स...
Comments
Post a Comment