मैं और बाबा साहब आंबेडकर
कुछ लोग तस्वीर पहनते हैं, कुछ लोग विचार।
मैं बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर को पहनता नहीं — जीता हूँ।
बाबा साहब: एक विचार, एक यात्रा
जब मैंने पहली बार बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर की तस्वीर वाली टी-शर्ट पहनी और खुद को आईने में देखा, तो वह सिर्फ़ एक पहनावा नहीं था। वह मेरे विचारों की पहचान थी। यह बताने का एक छोटा-सा प्रयास था कि मैं किस सोच के साथ खड़ा हूँ — समानता, शिक्षा और सामाजिक न्याय की सोच के साथ।
मेरे लिए बाबा साहब कोई दूर की ऐतिहासिक हस्ती नहीं हैं, बल्कि वे हर उस व्यक्ति की आवाज़ हैं जिसने अन्याय सहा, लेकिन झुका नहीं।
विचार से प्रेरित पहनावा, और पहनावे से आगे एक विचार
बहुत से लोग पूछते हैं —
“टी-शर्ट पहन लेने से क्या बदल जाएगा?”
मैं मानता हूँ, सिर्फ़ टी-शर्ट से कुछ नहीं बदलता।
लेकिन विचारों को अपनाने से बदलाव शुरू होता है।
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| समानता और सामाजिक न्याय के विचारों के साथ — बाबा साहब आंबेडकर से प्रेरणा |
जब मैं बाबा साहब की तस्वीर वाली टी-शर्ट पहनता हूँ, तो वह मुझे हर पल याद दिलाती है कि:
मुझे चुप नहीं रहना है
मुझे पढ़ना है
मुझे सवाल पूछने हैं
और ज़रूरत पड़े तो व्यवस्था के सामने खड़ा होना है
बाबा साहब ने कहा था —
“शिक्षा शेरनी का दूध है, जो पियेगा वह दहाड़ेगा।”
यह वाक्य सिर्फ़ किताबों में पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए है।
मेरी study table और बाबा साहब
मेरी अध्ययन मेज़ पर रखी बाबा साहब आंबेडकर पर लिखी किताबें मेरे लिए किसी सजावट का हिस्सा नहीं हैं।
वे मेरी सोच की नींव हैं।
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| मेरी अध्ययन मेज़ पर बाबा साहब आंबेडकर: विचार, संविधान और सामाजिक परिवर्तन |
इन किताबों को पढ़ते हुए मैंने समझा कि:
संविधान सिर्फ़ कानून की किताब नहीं है
यह करोड़ों दबे-कुचले लोगों के संघर्ष का दस्तावेज़ है
यह बराबरी का सपना है, जो काग़ज़ पर नहीं, समाज में उतरना चाहिए
जब मैं इन किताबों को पढ़ता हूँ, तो मुझे महसूस होता है कि बाबा साहब आज भी हमें रास्ता दिखा रहे हैं —
कि अधिकार मांगने नहीं, जागरूक होकर लेने होते हैं।
बाबा साहब और आज का समाज
आज जब समाज में:
जाति के नाम पर भेदभाव है
शिक्षा को व्यापार बना दिया गया है
और सवाल पूछने वालों को चुप कराने की कोशिश होती है
तब बाबा साहब की सोच और भी ज़रूरी हो जाती है।
वे हमें सिखाते हैं:
व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से नहीं, उसके विचार से होती है
लोकतंत्र सिर्फ़ वोट देने से नहीं, समान अधिकार से चलता है
मेरी कोशिश
मैं कोई बड़ा नेता या विद्वान नहीं हूँ।
मैं बस एक सामान्य इंसान हूँ, जो:
पढ़ना चाहता है
समझना चाहता है
और अपने आसपास के लोगों को भी जागरूक करना चाहता है
अगर मेरी टी-शर्ट, मेरी किताबें या मेरे लिखे शब्द
किसी एक व्यक्ति को भी सोचने पर मजबूर कर दें —
तो मैं मानूँगा कि मेरी कोशिश बेकार नहीं गई।
अंत में
बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर को मानना
सिर्फ़ उनकी तस्वीर लगाने या जयंतियाँ मनाने तक सीमित नहीं होना चाहिए।
उन्हें मानना मतलब:
शिक्षा को अपनाना
बराबरी की बात करना
और अन्याय के सामने चुप न रहना
मेरे लिए बाबा साहब एक नाम नहीं,
एक विचार हैं —
जो मेरी सोच, मेरे लेखन और मेरे जीवन के साथ चलते हैं।
-मैं मिन्हाज़!


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