मेरे हीरो बाबा साहब- The One & Only Dr. Ambedkar

 

भीमराव- एक ऐसा नाम जो प्रतीक है भेदभाव और असमानता से संघर्ष का और बराबरी की लकीर खीचने का.

जैसा की मैं अपनी कहानी में अक्सर जिक्र करता हूँ, मेरे अब्बू हमारे बचपन में ही गरीबी और जाहिलियत से बाहर निकालने का प्रण लेकर अपने पुरे परिवार बीबी बच्चों सहित दिल्ली चले गये. वहां हमारे अब्बू ने हमें पालने के लिए हर तरह की मजदूरी की, हमसब दिल्ली के परिवेश में ही ढल गए.

दिल्ली एक ऐसी जगह है जो पुरे भारत के हर एक हिस्से से आने वाले लोगों का जमघट है. वहां अच्छी स्चूलिंग में हमलोगों को जातीय भेदभाव की समझ कभी नहीं हो सकी. तो जहीर सी बात है बाबा साहब अम्बेडकर जैसा नाम और विचार मुझे कभी हिट ना हो पाया होगा.

सबकुछ बदला जब मैं बिहार अपने गाँव अपने घर लौट आया. यहाँ अब बस मैं था और मेरा जूनून था की स्वदेश मूवी के शाहरुख़ के तरह अपने गाँव में कुछ करना है.

गाँव की आबोहवा में धीरे-धीरे मुझे बड़का जात, छोटका जात, उंच-नीच, ये टोला वो टोला ये सब से वास्ता पड़ा और धीरे धीरे मुझे समझ आने लगा की यहाँ लोग शिक्षा रूपये पैसे से नहीं बल्कि जात से नीमरा और  बड़ीया (नीचा और उंचा) होता है. जब अगड़ी जात कही जाने वाले वर्ग से कोई तथाकथित निमरी जात वाले से मिलता तो बराबरी और सम्मान वाला भाव अक्सरहां ना के बराबर दिखती. धीरे धीरे इन नज़रों की मुझे समझ आने लगी.

गाँव समाज में महिलाओं के साथ हिंसा जो की पारिवारिक, यौन, शाब्दिक- हर तरह की महिला हिंसा का साक्षात्कार मुझे अक्सर होने लगा. 

मैं भले एक पढ़ा लिखा बीटेक ग्रेजुएट कई सारी मालती नॅशनल कमपनी में जॉब का अनुभव लेकर लौटा शख्स था लेकिन ये जो भारत की तस्वीर मुझे गाँव में दिखी, वो मेरे लिए जिदगी का एकदम नया और हैरान कर देने वाला चैप्टर था.

इन चीजों ने मुझे स्तिमुलेट किया की बाबा साहब भीमराव जी को गंभीरता से गहराई से पढ़ा और जाना जाए. क्योंकि मेरी बैचेनी को शांत करना और मुझे सही रास्ता दिखाना अब सिर्फ एक ही इंसान कर सकता था- डॉक्टर भीमराव आंबेडकर. 
भले बाबा साहब हमारे बीच जीवित मौजूद ना हो लेकिन उन्होंने जो हजारो लाखो पन्ने लिखकर खुद को उन पन्नो में जीवित कर लिया है, उन पन्नों के जरिये तो मैं बाबा साहब से बात कर ही सकता हूँ ? है की नहीं ?


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